सोमवार, २५ सप्टेंबर, २०१७

अनुपम काव्य


वह गंध मेरे मन बस गयी रे


इक बन जुही इक बन बेला

अगणित गंधो का यह मेला

पाकर मुझको निपट अकेला

इन प्राणो को कस गयी रे

वह गंध मेरे मन बस गयी रे


इक दिन पश्चिम इक दिन पूरब

भटक रहे है गंध पंख सब

रोम रोम के द्वार खोलकर

वह अंतर में धंस गयी रे

वह गंध मेरे मन बस गयी रे


नभ में जिसकी डाले अटकी

थल पर जिसकी कलियाँ चटखी

मेरे जीवन के कर्दन में

वह अनजाने फंस गयी रे

वह गंध मेरे मन बस गयी रे

🌼

पिया खोलो किवाड 

पिया खोलो किवाड 

पिया खोलो किवाड

कोयल कि गुंजी पुकारे


पतझड को भुली

हर डाली फुली 

बीती को हम भी बिसारे


गुंगी थी घडियां 

गीतो कि कडियां

वीणा को फिर से झंकारे 


माना कि दुख है 

विधना विमुख है

आओ उसे ललकारे


पिया खोलो किवाड

पिया खोलो किवाड

कोयल कि गुंजी पुकारे
🌼


द्वार अभी तक खुला नही


तन के तट पर मिले हम कई बार 

पर द्वार मन का अभी तक खुला हि नही


जिंदगी कि बिछी सर्फ सी धार पर

अश्रु के साथ हि कहकहे बह गये

ओठ ऐसे सिये शर्म कि डोर से

बोल दो थे मगर अनकहे रह गये


सैर करके चमन कि मिला क्या हमे

रंग कलियो का अब तक घुला हि नही
🌼


दोहे

सबकी पूजा एकसी अलग अलग है रीत
मस्ज़ीद जाये मौलवी कोयल गाये गीत

चाहे गीता बाचीये या पढिये कुरआन
मेरा तेरा प्यार हि हर पुस्तक का ज्ञान
🌼

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