सोमवार, २५ सप्टेंबर, २०१७

शेर-ओ-शायरी

(उर्दु शब्दकोश सौजन्य rekhta.org)

जाहिद शराब पिने दे मस्जिद में बैठकर
या फिर वो जगह बता दे जहां खुदा न हो
🌼

ऐ दिल तुझे रोना है तो जी भर के यहा रो ले
दुनिया से बडा वीराना कही न मिलेगा
🌼

आता है जजबा-ए-दिल को वो अंदाज-ए-मयकशी
रिंदो में रिंद भी रहे दामन भी तर न हो
🌼


अपने सीने से लगाये हुये उम्मीद कि लाश
मुद्दत-ए-ज़िश्त को नाशाद किया मैने
🌼


उम्र फा़नी है तो मौत से डरना कैसा
इक ना इक दिन ये हंगामा हुआ रखा है
🌼


इश्क़ से तबियत में ज़ीस्त का मजा पाया
दर्द कि दवा पायी दर्द बे दवा पाया
हसरत-ए-कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना
🌼


चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दिवानगी अपनी
वगर्ना हम जमानेभर को समझाने कहां जाते
🌼


ना शिवाले, ना कलिसा, ना हरम झुठे है
सच तो ये है के तुम झुठे हो, हम झुठे है
उनसे मिलते है तो खुश होते है उनसे मिलकर
शहर के लोगों से वो थोडे कम झुठे है
🌼


बैठे बैठे मुझे आया गुनाहो का ख्याल 
आज शायद तेरी रहमत ने किया याद मुझे
🌼


याद एक जख्म बन गई है वरना
भुल जाने का कुछ ख्याल तो था
🌼


गो न समझु उसकी बातें गो न पाऊं उसका भेद
पर यह क्या कम है कि मुझसे वो परी पैकर खुला
🌼


कुछ वक्त कट गया जो तेरी याद के बगैर
हम पर तमाम उम्र वो लम्हे गिरां रहे
🌼


दु:ख को बहुत सहेज के रखना पडा हमे
सुख तो किसी कपूर कि टिकिया सा उड गया
अब सबसे पुछता हु बताओ तो कौन था
वो बदनसीब शख्स जो मेरी जगह जिया
🌼


मै तुम्हारी रहमत का उम्मीदवार आया हुं 
मुह ढांपे कफ़न से शर्मसार आया हुं
आने न दिया बार-ए-गुनाहो ने पैदल
ताबूत में कान्धो पे सवार आया हुं
🌼


मिले थे एक मुद्दत के बाद मगर, मैने पहचान लिया तुमको
मुलाकात खत्म होते होते जाना, एक अजनबी से रूबरू था मै
🌼


घर से निकलो धुप में नहाकर देखो
जिंदगी क्या है किताबो को हटाकर देखो
फासले आंखो का धोखा भी हो सकते है
वो मिले या ना मिले हाथ बढाकर देखो
🌼


अल्ला से दुआ माँगी 
कि दुश्मनों से जान छुटे
हो गयी कुबुल शायद
अचानक दोस्त कम हो गए
🌼


तेरे पास आके हम बडी उलझनो में है
हम तेरे दोस्तो में है कि तेरे दुष्मनो में है
🌼


हमने तो न चाहा था कभी ऐसा कुछ भी
कभी मोहोब्बत के नाम से डरते थे हम भी
खुदा को भी मगर यही मंजूर था शायद
के मेरा दिल पुकारे तो सुने आप भी
🌼


घर से मस्जि़द है बहोत दूर चलो युं करले
किसी रोते हुये बच्चे को हसाया जाये
🌼- निदा फाझ़ली


सिर्फ एकही उल्लु काफ़ी था
बर्बाद -ए-गुलिस्तां करने को
हर डाल पे उल्लु बैठा है
अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा 
🌼- इक्बाल


जिक्र उस परीवश का और फिर बयां अपना
बन गया रक़िब आखिर था जो राजदान अपना
🌼- ग़ालिब

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